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अब न जाने कैसा होगा मेरा गाँव



क्योंकि अब तो ......
न वो चौपाल हैं
न वो गौ-पाल हैं
न वो पनघट है
न वो युवाओं
का जमघट है
न वो पनिहारिन हैं
न वो मजदूरिन हैं
न वो चेतवान हैं
न वो किसान हैं
न वो चरवैये हैं
न वो गवैये हैं
न वो घर खपरैल हैं
न गुल्ली-डंडा खेल हैं
न वो गन्नों के खेत हैं
न वो मास्साब की बेंत हैं
जहाँ हम नहाते थे
न वो घाट हैं
न वो कच्ची पगडंडी
और न वो बाट हैं
जहाँ जेठ की धूप थक कर
आराम फरमाती थी
न वो नीम की छाँव हैं
न वो ठाँव हैं
सब कुछ बदल चुका है अब
बचे अब न वो लोग हैं
बचा न अब वो गाँव है ।

        गणेश मादुलकर (मुसाफ़िर)
                हरदा मध्यप्रदेश

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