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कुछ बातें अनुभव की




बिन सवेरा शाम कभी ढ़लती नहीं
भीगी रेत आसानी से मुट्ठी से फ़िसलती नहीं
हर उम्मीद से जीने की तमन्ना बढ़ती जाती है
ऐसे ही ये ज़िन्दगी निकलती नहीं
सुखी ज़मीन भी तो बंजर कहलाती है
तभी तो उसे उर्वर बनाने बारिश चली आती है
खुशियों के साथ आँसुयों का होना ज़रूरी है
भीगोके आंगन दोबारा नए उम्मीद जगाती है
सुख-दुख का संगम बड़ा न्यारा है
पास हैं अनजान...दूर वो जो सबसे प्यारा है
दर्द पे मरहम कभी लग जाए तो ठीक वरना
दुखती नस को बस आँसुयों का सहारा है
किनारे पे बैठे मझदार की बातें न करो
वहाँ तूफ़ान बड़ा गहरा है
हर चेहरे पे भरोसा मत करना
हर चेहरे के पीछे छुपा एक और चेहरा है
मीठे अल्फ़ाज़ भी कानों में ज़हर घोल देती है
कड़वे सच हमेशा पहेलियाँ सुलझा देती है
संयम को हमेशा हाथ से जोड़े रखना क्योंकि
बहती भावनाएं ज़िन्दगी उलझा देती हैं
आँखों के सपनों का कभी
होंठों से ज़िक्र न किया करो
हौसला मन में रखना…किस्मत का लिखा सब मिलेगा
बेफालतू यूँ फ़िक्र न किया करो
ज़िन्दगी के इस सैलाब में
अपनी कश्ती ख़ुद ही बनाना
बह जाए अरमानों का नाव तो 
किसी और को दोषी मत बताना….
हर शाम ज़िन्दगी का एक दिन ढल जाता है
हर दिन के साथ एक एक मौका यूँही निकल जाता है
भिगोए रखना अपने सपनों की रेत को
क्योंकि सुखी रेत आसानी से मुट्ठी से फ़िसल जाता है...

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Shubhdristi